Is breastfeeding in public provocative?

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अगर आप आत्मा की शांति और प्यार चाहते हैं, तो दर्द को भीतर ही अनुभव कीजिए।

गोकुल से वृंदावन की ओर धीरे-धीरे बढ़ती हुई बैलगाड़ी में बैठी बारह वर्ष की राधा, बैलों के गले में बंधी घंटियों की सुरीली ध्वनि के साथ एक मधुर कल्पनालोक में विहार करने लगी। आह, जीवन कितना आनन्द और उल्लासमय है और फिर, कान्हा जैसा बालक से परिचय हो जाए, फिर तो पूछना ही क्या। राधा पहली बार अपने वृषभानु से मिलने वृंदावन जा रही थी। उसे क्या पता था कि जब मिलेंगे तो हमारे साथ ऐसा होगा। शायद मिलने के बाद किसी दिन गाँव के पहचान वालों ने इन्हें साथ में देख लिया। मैनें भी आपनी आँखों से देखा, कैसे कृष्णा को कुछ लोग पीट-पीटकर अधमरा कर रहें हैं। कुछ लोग केह रहे हैं लौंडे को इतना पीटिये कि सारा प्यार का भूत उतर जाये। एक दूसरे लोग केह रहे थें- शादी कर दीजिये लौंडे का मन शांत हो जाएगा।

मुझे बड़ा आश्चर्य और गुस्सा लगा जब एक महाशय ने छोरी को भी दो-चार तमाचे जड़ दिये। इकट्ठा भीड़ केह रही थी- इस लौंडी का भी कम दोष नहीं है, यही छोरे को उकसाती है। ओह, कैसे बदलेंगे हम? खैर।

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मैं इस post को लिखते हुए काफी खुश, excited और मजाकिया मेहसूस कर रहा हूँ। 😊 मैं Friend और Girlfriend को लेकर हमेशा Confuse रहा हूँ कि एक Classmate Girl को क्या कहना उचित होगा Friend या Girlfriend? किसी दोस्त ने मुझे समझाया, भाई भूलकर भी किसी लड़की को Girlfriend मत कहना, नहीं तो तुम्हारी हाल सुल्तान (Film) जैसी हो जायेगी। अब मैं असमंजस में हूँ कि यदि कोई Girl मेरी Friend है तो उसे Girlfriend क्यूँ नहीं कह सकता। इसका जवाब जानने के लिए मैनें Google किया, “What does the difference between Friend and Girlfriend?” जिसका जवाब मैं कुछ इस तरह पाया-

“A friend is defined as a person who is known to someone and knows him well too, someone who treats him well too, someone who treats the some person with affective and loyalty…A girlfriend is just that, a friend who is a girl, It can be a platonic relationship or a romantic relationship”

यानी इसका आशय यह निकलता है कि, आप किसी Girl को Girlfriend तभी केह सकते हैं, जब दोनों तरफ से आँखें चार हो। 😊 खैर, जो भी हो। शायद इसी का नाम “Love” दिया गया है, पर जो हमें हिंदी में प्यार, मोहब्बत, दास्ता कहने में मजा और सूकून मिलता है, वो Love you कहने में नहीं आता, और प्यार में गजल शामिल न हो तो सबकुछ फीका। कुछ रोचक गजल/शायरी..

  • मैं अपनी पूरी जिंदगी तुमसे तंग होना चाहता हूँ।
  • अपने जीवन के सबसे खूबसूरत और मीठे शब्द “प्यार” मैनें तेरे नाम किया।
  • तुम्हें पाने की ज्यादा लालसा नहीं, पर तुम्हें खोने का बहुत डर सताता है मुझे।
  • शायद तुम सीख रही हो मुझसे दूर भागना, और मैं सीख रहा हूँ फिर से प्यार बाँटना।

कितना अच्छा लगता है अपने प्यार का ठीक-ठीक अर्थ समझना और समझाने में, पर कुछ लोग ही इसे जीवन में उतार पाते हैं। अपनी चरमतम डुबान के क्षणों में पता नहीं क्यों, अक्सर मैनें पाया है कि मेरी रसविभोर दृष्टि के आगे तैर जाते हैं कुछ उदास अनपहचाने चेहरे, कुछ घुटते हुए अपरिचित जीवन, और फिर छोड़ दुनिया को दौड़ पड़ते हैं उनके पीछे, पता नहीं ऐसा खिचाव पैदा क्यूँ होता है?

शायद ही इस दुनिया में किसी ने बेवजह के अलावा कोई दूसरा जवाब दिया हो। एक जिद्द सी पैदा हो जाती है और यही ख्वाब का रूप लेे लेता है। बहुत लोग तो हिंसा कर बैैैठते हैं इसके लिए, जिंदगी का आखिरी पल इसे ही समझ लेते हैं और फिर लटक जाते है फंदे पर।

पर ऐसी हिंसात्मक, आत्मपीड़ा कदम नहीं उठाने चाहिए, बल्कि खुद को और मजबूत बनाने चाहिए। इस उम्मीद के साथ कि ” मैं बेहद शुक्रगुजार हूँ उनका जिन्होंने समझा नहीं खुद के काबिल मुझे, क्योंकि उन्हें यकीन था कि जो मुझे बेहद प्यार दे सकता है उसकी जरूरत सिर्फ मुझे नहीं पूरी दुनिया को है, जो मैं कर सकता हूँ। शायद इसलिए उन्होंने दूरी बनाई मुझसे।”

मैं भी कभी इस ब्रह्माण्ड में चंद्रमा बन गया था और लगाने लगा पृथ्वी का चक्कर……..। अब आगे मेरे लिए उस हालत को बयां करना आसान नहीं होगा, पर मैं अक्सर उस पल को याद कर खुश हो जाता हूँ और मुझे ऐसा लगता है कि आज मुझे बेवजह खुश होने के लिए वो चीजें भी होनी जरूरी थी। किसी ने सच ही कहा है।

  • अगर आप आत्मा की शांति और प्यार चाहते हैं तो दर्द को भीतर ही अनुभव कीजिए।
  • हम प्यार और नफरत किसी से तभी कर सकते हैं, जब हम अपने आप से प्यार करना छोड़ दें।

हमें ये कहते हुए खुश होना चाहिए कि-

“उदासी के इस दौर में, मैनें बना लिये हैं । मुस्कुराहटों के कुछ ठिकाने, और हर ठोकरे के बाद खरोंचता हूँ मिट्टी कि मिल जाए तुम्हारा कोई निशां……..।

औल ढ़ूंढ़ लुं उसमें जीने की वजह…….।😊

धार्मिक होना एक उचित पागलपन।

धर्म के संबंध में प्रोफेसर महावीर सरन जैन का कथन है कि आज धर्म के जिस रुप को प्रचारित और व्याख्यायित किया जा रहा है उससे बचने की जरुरत है। वास्तव में धर्म संप्रदाय नहीं है। जीवन में हमें जो धारण करना चाहिए वही धर्म है, नैतिक मूल्यों का आचरण ही धर्म है। आइये इसे कुछ सवालों के द्वारा और बेहतर से समझते हैं।

Kumar : आप धर्म को कैसे परिभाषित करेंगीं या एक ‘धर्म’ होने के लिए वह कौन-सी अवधारणा अथवा विश्वास प्रणाली होनी चाहिए?

Swati Routh : धर्म को परिभाषित करना किसी सीमा को लांघने के समान है। ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों दिशाएं अनिश्चितता से भरी है। क्योंकि मानवीय विश्वास संरचनाएं विविध और जटिल है। फिर भी अगर हम कुछ सवालों (जैसे- हम यहाँ कैसे आए? हम क्यों मरते हैं? हम यहाँ क्यों है?) को गहराई से समझते हैं तो हम पाते हैं कि सभी धर्मों का एक ही सार है, इसलिए जीवन में धर्म का उधेश्य ‘उधेश्य देना और विश्वास पैदा करना है, जो विज्ञान से बिल्कुल पड़े है और मुझे लगता है कि यह एक उचित पागलपन है।

Kumar : क्या ये कहना उचित होगा कि धर्म का होना हमारे लिए आवश्यक है?

Swati Routh : धर्म का होना आवश्यक तो नहीं परन्तु इसे अनावश्यक भी नहीं कहा जा सकता।

  • आवश्यक इसलिए नहीं कि एक नास्तिक व्यक्ति भी धर्म और ईश्वर में असीम विश्वास रखने वाले व्यक्ति की तरह जी सकता है। आपको एक अच्छे व्यक्ति होने के लिए धार्मिक होना जरूरी नहीं है, अगर आपको ये पता हो कि नैतिक रूप से सही और गलत क्या है? एक धार्मिक व्यक्ति किसी की हत्या सिर्फ इसलिए नहीं करेगा क्योंकि वो मानता है कि ये कर्म उसे नरक में ले जायेगा। परन्तु एक योग्य और समझदार व्यक्ति सिर्फ यह जानता है कि ऐसा करना गलत बात है। अगर वो हत्या करता है भी, तो उसमें इतना विवेक है कि उसे किसकी हत्या करनी है।
  • अनावश्यक इसलिए नहीं है क्योंकि यह उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो इस बात पर विश्वास करते हैं कि आध्यात्मिक एक जरूरी चीज है और उनके जीवन को बढ़ाने के लिए किसी भावनात्मक समर्थन की जरूरत है। शायद उनलोगों के लिए यह एक अच्छा विकल्प है, जिन्हें अपने जीवन को समझने की जरूरत है।

Kumar : धर्म हमें विभन्न समुदायों और सामाजिक सीमाओं में बाँधकर रखता है। जो हमारे अंदर कलेश उत्पन्न करता है। जिस कारण सामाजिक समस्याएं उत्पन्न होती है, तो क्या ये कहना सही होगा कि पूरे मानव जाति के लिए धर्म का एक पहचान हो?

Swati Routh : हिंसा होना यह बताता है कि चीजों में सहन करने और स्थाई बने रहने की क्षमता का अभाव है, और लगभग हरेक मनुष्य के लिए इसे स्थिर बनाये रखना लगभग असंभव-सा होता है। हिंसा होना किसी धर्म से नहीं जोड़ा जा सकता। अगर हिंसा का होना विपरीत धर्म होता तो आज हम अपने परिवार में ही झगड़े नहीं कर रहे होतें। अगर कोई आपके दीमाग पर बंंदूूूक की नोक सटाकर पूछे कि अपना धर्म बताओ? तो आपका जवाब क्या होगा?

परंपरा एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ किसी विषय या उपविषय पर बिना तथ्य और कारण जाने, बिना किसी बदलाव के उसे एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ीयों में संचारित करते जाना और जब तक हम इस परंपरा को ढ़ोते रहेंगे तबतक ये कहना बिल्कुल आसान नहीं है कि हरेक मनुष्य के लिए बिना किसी प्रतीक चिन्ह के हम एक अदृश्य शक्ति को भगवान मान लें। हालांकि इसकी शुरुआत हम खुद से कर सकते हैं।

Kumar : तो आपके कहने का क्या तात्पर्य है कि आप एक घोर नास्तिक हैं?

Swati Routh : नहीं- नहीं ऐसा नहीं है! मैं न ही घोर नास्तिक हूँ न ही घनघोर आस्तिक। 😊

मेरे लिए धर्म एक ऐसा उपकरण है जो मुझे मनुष्य के रूप में आध्यात्मिक रूप से विकसित करने में मदद करता है, पर मेरे जीवन में भगवान का कोई चित्रित अवधारणा नहीं है। मैं इब बात में पूरा विश्वास करती हूँ कि प्रकृति ही हरेक सजीव और निर्जीव चीजों के लिए Creator और Destroyer के रुप में काम कर रहा है। वास्तव में किसी को नहीं पता कि ‘God’ सच में अस्तित्व में हैं या नहीं?

परन्तु दुनिया में एक ऐसे चीज का होना आवश्यक समझती हूँ, जिससे आपको सहानुभूति मिले। जिसपे आप विश्वास कर सकें। जहाँ आप अपनी संवेदना को जिंदा रख सकें। यह आवश्यक नहीं कि यह God ही हों। यह आपपर निर्भर है कि आप सबसे करीब किसके हैं? माँ, पिता, गुरु आदि।

ईश्वर में विश्वास रखना अच्छी बात है लेकिन अंधाधूंधता बिल्कुल सही नहीं। आप किसी भी धर्म को उठाओ और उसमें किये गए प्रथाओं के बारे में पढ़ें, आप पाएंगे कि कितनी बेवकूफ प्रथाएं थीं और आज भी कुछ हमारे बीच घूम रहे हैं। जबकि आज हम बेहतर तरीके से ये जानते हैं कि चीजें कैसे Universe में Operate कर रही है।

Kumar : फिर भी तो Science ये मानने को तैयार नहीं है कि अदृश्य शक्ति (God) जैसी कोई चीज नहीं होती है, जो इस पूरे Universe को चला रही है।

Swati Routh : क्षमा करें! बिना विज्ञान के सहारे मैं भी इस सवाल का जवाब नहीं दे सकती। परन्तु यहाँ हम किसी दूसरे उदाहरण को ले सकते हैं।

  • मान लें आपने अपने Mobile पर Internet Connection लिया लेकिन इसका इस्तेमाल किसी दूसरे Mobile में कर रहे हैं। शायद इसे आप Define भी कर सकते हैं कि ये कैसे काम कर रहा है लेकिन आप इसे देख नहीं पा रहें। लोग कहते हैं कि इंसान मरने के बाद Heaven में जाता है। शायद आप भी इस बात से सहमत होंगे, परन्तु उस इंसान का क्या जिसे मनुष्य ने अपने Test tube baby ( IVF) प्रणाली द्वारा बनाया?
  • मान लें ब्रह्मांड दो तरीकों से आया है। (i) प्राकृतिक प्रक्रियाओं से (ii) ईश्वरीय शक्तियों से (जिसे आस्तिक मानते हैं) अगर पूछा जाय- तो फिर Big Bang (महाविस्फोट) के पहले क्या था? इसका जवाब Scientists को भी वास्तव में नहीं पता, लेकिन वे इस काम में लगे हैं। अगर यही सवाल आस्तिक से पूछा जाय कि “ईश्वर ने ब्रह्मांड का निर्माण करने के पहले क्या किया था?” उनका जवाब होगा- “भगवान हमेशा रहते थें और हमेशा रहेंगें।” 😊 अच्छा, ये जवाब बिल्कुल उचित नहीं है, है न! सत्य की खोज में तर्क कि आवश्यकता नहीं है।

Kumar : आप वो कौन-सी राय देना चाहेंगी, जो बिना किसी दबाव के हम कर सकते हैं?

Swati Routh :

  • हमें किसी ऐसे चमत्कारिक व्यक्ति की तलाश में नहीं रहनी चाहिए जो खुद को भगवान बनाने की कोशिश में लगे हों। बजाए ये बताने के कि, भगवान का कोई चित्रित प्रमाण नहीं है।
  • अगर आप आस्तिक हैं तो अपने धर्म को दृढ़ता से जीऐं तथा अनैतिक मूल्यों एवं अव्यवहारिक परम्पराओं से दूरी बनायें।
  • मानव मूल्यों को तार्किक रूप से सोचें। किसी अप्रमाणित मान्यताओं को रहस्य न बने रहने दें। इसके वैज्ञानिक कारण जानने की कोशिश करें।
  • हमारे मरने के बाद, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि हम क्या थें? हमने क्या सीखा था? हम धार्मिक थें या नहीं? लेकिन यह जरूर महत्व रखता है कि आपने उच्चतम नैतिक मानकों तक जीवन जीने का पूरा प्रयास किया।
  • अपने आप पर यकीन रखें।
  • इस वर्ष बारिश नही हुई, शायद हमने दिव्य देवता को नाराज किया? ये कल्पना सिर्फ यह दर्शाता है कि लोग अपनी चेतना से डरे हुए हैं।
  • सभी लोग धर्म के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन वास्तव में हर इंसान एक समान है। ये जानते हुए भी हम इसे स्वीकारने को तैयार नहीं है। इसे हमें मानना पड़ेगा।
  • यदि आप धर्म समर्थक नहीं तो विरोध का बेहतर तरीका अपनायें और सावधान रहें।
  • आप अपने हौंसलों पर अपनी स्वतंत्रता, अपने पैसे, अपनी बुद्धि और अपनी आत्मा के साथ आगे बढ़ते रहें। धन्यवाद!

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शिक्षा का उद्देश्य समस्याओं का समाधान हो, धन अर्जित करने का माध्यम नहीं।

Abhimanyu एक 16 वर्षीय छात्र था, जो 11वीं कक्षा में पढ़ता था। March, 2014 में उसका मृत शरीर उसके Family apartment के छत पर पाया गया, जिसने Suicide के पूर्व अपने Chemistry exam sheet में एक Suicide note रख दिया था। जिसमें लिखा था-

“The CBSE system is based on mugging. Education should be about understanding and applying your knowledge. My death should be a lesson and a reason for the system to change”

इतने आसान शब्दों में शिक्षा का सही मतलब मेरे पास भी नहीं था। अफसोस है कि हमनें एक प्रतिभा खो दिया।

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हमारा देश एक बहुत ही प्रतिस्पर्धी देश है जहाँ जगते के साथ ही हमारी प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। गौर करनेवाली बात यह है कि ये प्रतिस्पर्धा हमारे अंदर होने के बजाय हमारे बाहर अपने लोगों के साथ ही हो रही है, जहां हमें मिलकर काम करने चाहिए थें। मानव संसाधन का तभी महत्व है जब इन्हें उचित शिक्षा और स्वास्थ मिले। आइये शिक्षा क्षेत्र से जुड़े उन कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को देखते हैं। जिसका हम सभी सामना कर रहे हैं।

1. देश के आधे हिस्से में आज भी उचित शिक्षा का अभाव है। इनमें से कुछ ही उच्च शिक्षा (University) में जाने के योग्य हो पाते हैं।

  • गरीब बच्चों के लिए Primary education का निम्न स्तर होना। उनकी आवश्यक सुविधाओं Infrastructure, (शौच) तक का स्तर निम्न होना।
  • कुछ अच्छे विद्यालय हैं भी तो उनमें limited seats का होना। यहीं से बच्चों पर उनके parents द्वारा compete करने और ज्यादा-से-ज्यादा Marks लाने का दबाव बढ़ता है।
  • यदि कोई छात्र पढ़ाई के अलावा दूसरे कार्य में ज्यादा Involve है तो हमें उसके Creativity को बढ़ाने के बजाय Parents कहते हैं- “What are you doing?, चलो बेटा बहुत हो गया।” देखना Mamma मैं Sachin बनूँगा। क्या कहा…? Sachin! चल मैं तुझे विराट बल्ला दिखाती हूँ। I said No तो No.
  • मैनें कई लोगों को ये कहते सुना है कि University कम है, Colleges कम हैं, इनमें seats limit हैं, तो competition तो होगा ही। पर मैं पूछना चाहता हूँ, तो Economic, Sociology, Hindi, Sanskrit, Agriculture आदि जैसे विषयों में सीटें खाली क्यूं रह जाती है? क्या ये विषय अच्छे नहीं है? या इसे पढ़ना अच्छा नहीं लगता या इसमें Scope ही नहीं हैं? आप बात पकड़ रहे हैं न? Scope क्यूं नहीं दिखाई देता, क्योंकि Sharma ji का लड़का Engineer है। Mamta की बड़ी बेटी CAT और छोटी वाली Medical की तैयारी कर रही है। हमारे देश में दो चीजें जितनी जल्दी हो सके अच्छा माना जाता है। पहला पढ़ाई और दूसरा शादी।
  • कोई बड़ी Competition नहीं होगी हमारे देश में, अगर हमारा समाज/परिवार बच्चों को ये न दवाब दे कि तुम्हें Science पढ़ना है। फिर Engineer बनना है। इसका असर ये हुआ कि Demand और Supply ने Engineers की खिचड़ी बना दी।
  • दूसरा कारण यह हो सकता है कि जब हमारी उम्र खेलने-कूदने और हमारे रुझान को समझने की बारी थी तो हमें पढ़ने के लिए Force किया गया और जब हमें पढ़ने और अपने Passion को Polish करने की बारी आई तो बेचारे आशिकी में पड़ गये।

2. पैसे कमाने के उद्देश्य से पढ़ाई का दबाव

  • Parents और Society का मानना है कि पढ़ाई करने का उद्देश्य ही Financial Security है। अगर बेटे ने 4 साल University में बिताकर अच्छी Job न ली तो- क्या बताये Sharma ji बेटा निकम्मा निकल गया। अगर Government Job मिल गई तो कहना ही क्या! भले ही Student life में आपको एक भी लड़की ने भाव नहीं दिया हो, पर अब तो फिक्र ही छोड़ दे। अब तो सिर्फ Fair complexion का ही Proposal accept करेंगे दुल्हे राजा!

3. अपने विषय के दायरे को सीमित कर लेना।

  • Science लिया है तो Doctor, Engineer, Arts लिया है तो Government Job, Commerce लिया है तो Bank, CA. Government Job के लिए आवश्यक उम्र खत्म होने के बाद ही हम शिक्षक, स्व-रोजगार, समाजसेवक, खेती आदि जैसे क्षेत्रों में अपना वजूद ढ़ूंढते हैं।

4. Reservation system

  • उच्चवर्गीय लोगों का मानना है कि Reservation प्रणाली सही नहीं है क्योंकि इससे वे अच्छे merits के रहते हुए भी अच्छे Colleges और Government jobs के लिए अवसर खो देते हैं।
  • निम्नवर्गीय लोगों का कहना है कि हमें इनकी आवश्यकता है। क्योंकि वे अमीरों से तुलनात्मक सुविधाओं के अभाव में रहकर उनसे आगे नहीं बढ़ पायेंगे। सच्चाई यह भी है कि सभी उच्चवर्णीय परिवार सुविधा संपन्न नहीं है।

परन्तु अगर हम गौर करें तो हम पाते हैं कि हमारे देश में गरबों की संख्या उच्चवर्णीय जाति की तुलना में निम्नवर्गीय जाति के अधिक लोग हैं। शायद इसी कारण इसे पूरी तरह समाप्त करना आसान नहीं रहा। अगर हम Reservation system को शिक्षा से खत्म कर भी दें तो इन्हें समान अवसर देने के लिए हमें दूसरे विकल्प ढ़ूंढने होंगे और इसके लिए अधिक धन व्यय करने पड़ेंगे। जो सरकार के लिए घाटे का सौदा है। इसे थोड़ी धीमी-तेज गति में समाप्त करना बेहतर होगा। परन्तु यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इनकी मांगें घटने के बजाय बढ़ती जा रही है। जिसे सरकार को कतई नहीं मानना चाहिए शिक्षा क्षेत्र में।

5. There is no competition between Schools, Colleges and Universities

  • हमारी सरकारें की यह एक दोषपूर्ण नीति है कि वे शिक्षा को Profit-organization से अलग रखकर इसे एकाधिकार में लाना चाहती है। अब Monopoly में प्रतिस्पर्धा कैसे होगा? और बिना प्रतिस्पर्धा का बेहतर शिक्षा कैसे मिलेगा?
  • आप Control कीजिए इनके लूटने के तरीकों को Profit बचाने के तरीकों को नहीं। Coaching संस्थाओं में देख लीजिए students एक पैसा किसी को फोकट में देने वाले नहीं है। जहाँ इन्हें पढ़ाई पसंद आई, वहाँ लाखों की भीड़ लगती है और दूसरी ओर भी देख लीजिए जहाँ Teachers अगरबत्ती जलाएं बैठे हैं। भगवान कहे जाने वाले Doctors के लूटने के तरके तो आपको पता ही होगा। यही तरीका शिक्षा में भी घुस आया है। बस आप इन तरीकों से हमें बचाए रखें।

सरकारी नहीं, सामाजिक पहल से तेज बढ़ता है समाज।

दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हुए जो अपने परिश्रम, हुनर, श्रम के बल और शक्ति के बल अपने-अपने दौर की दुनिया के धनवान लोगों में से एक हुए, जिसे समाज ने लुटेरे धनवान की संज्ञा दी। भले ही इन्होंने कुछ मिले-जुले (सही और गलत) तरीकों से धनवान हुए हो पर ऐसे कुछ-लोगों की एक पहल ने समाज को आगे बढ़ा दिया। आइए इसे कुछ बिंदुवार कहानियों द्वारा समझते हैं।

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1900 ई० में America के धनवान व्यवसायी कार्नेगी ने जेपी मॉर्गन को अपना सारा स्टील व्यवसाय बेच दिया। जब यह सौदा हुआ, तो मॉर्गन ने कार्नेगी से हाथ मिलाते हुए कहा, “बधाई हो आप दुनिया के सबसे धनवान व्यक्ति बन गये।” तभी से उन्होंने मृत्यु तक जिंदगी की पूरी कमाई परोपकार में लगा दी। उन्होंने कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिये, जिसमें से एक Carnegie Mellon University है जो आज दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में शुमार है।

अमेरिका के धनी व्यवसायी लीलैंड स्टैनफोर्ड जिन्हें अधिकतम धन कमाने की लालसा थी। इन्हें एक पुत्र था, दुर्भाग्यवश उसकी 15 वर्ष की आयु में ही मृत्यु हो गयी। इस सदमें के बाद स्टैनफोर्ड दंपति ने तय किया कि कैलिफोर्निया शहर के बच्चे अब हमारे बच्चे होंगे। अपने बेटे की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए स्टैनफोर्ड ने कई University का दौरा किया। वे Harvard गये, IIM गये, Hopkins University भी देखा। इसके बाद उन्होंने तय किया कि कैलिफोर्निया में एक नया विश्वविद्यालय बनायेंगे।
Oct.1891 में Stanford University बना, तब कुछेक अखबारों ने लिखा कि Stanford के professor संगमरमर हॉल में खाली कुर्सियों को पढ़ायेंगे। Stanford का सपना था कि इस विश्वविद्यालय से आम लोगों का कल्याण हो। पर 1893 में Leland Stanford की मृत्यु हो गयी। उनकी संपत्ति के उपयोग पर रोक लग गयी। University में आर्थिक संकट आ गया, तब Stanford की wife, Jane stanford ने अपनी निजी आमदनी को इस University में लगाने का फैसला किया। Jane Stanford, London गयीं। अपने गहने बेचने के लिए, ताकि विश्वविद्यालय बंद न हो। 1899 में Stanford की संपत्ति पर लगी रोक हटी, तो Jane Stanford ने अपने पति के व्यवसाय को बेच कर 11 million dollar इस University को दे दिया। तब इस University के अध्यक्ष ने कहा,

“इन छह कठिन सालों में इस विश्वविद्यालय का भविष्य एक बेहद नाजुक धागे से बंधा था, और यह धागा है, एक बेहतरीन औरत का स्नेह।” इसी University ने इन्हें कुलमाता की उपाधि दी।

1939 में डेविड पेकार्ड व विलयम हेवलेट ने इसी University में पढ़कर अपने गैराज में एक Electronic company स्थापित की। यही Silicon Valley का जन्म स्थान माना जाता है और इसी Silicon Valley ने दुनिया के कामकाज का तरीका, सोचने का नजरिया सब कुछ बदल दिया।
● इसी तरह Johns Hopkins University की कथा है। 1795 में Johns Hopking का जन्म तंबाकू फॉर्म में हुआ। बचपन में वह अपने चाचा के थोक किराना व्यापार में सहयोग करते थें। इसी दौरान उसने अपनी चचेरी बहन से प्रेम कर बैठे। इसका विरोध हूआ, Johns Hopking और उनकी चचेरी बहन आजीवन अविवाहित ही रहे। उन्होंने अपना व्यवसाय बढ़ाया। 1887 में उनकी मौत हुई। लगभग 7 crore dollar दो संस्थानों के लिए छोड़कर गये। जिनके सहयोग से Johns Hopking University बना। जिससे अबतक में 36 नोबेल पुरुस्कार विजेेेता निकलें।

इन कहानियों का आशय यह है कि “धनी लोग संपत्ति के ट्रस्टी मात्र हैं। धनवानों का यह नैतिक दायित्व है कि वे अपने धन का उपयोग सामान्य लोगों की बेहतरी और उनके हित में करें।” इसका कतई यह मतलब नहीं है कि समाज में योगदान देने के लिए धन का होना आवश्यक है।

कहने का तात्पर्य यह है कि :-

बदलाव लाने के लिए हमें किसी के सहारे का होना अतिआवश्यक नहीं है। बस हमें एक सही नजरिए की जरूरत है और वह नजरिया हमारे विश्वविद्यालय, स्कूल और वह समाज है जो इन्हें बेहतर तरीके से गढ़ते हैं।

हमारे देश में हमेशा ये सुनने/देखने को मिलता है कि 22 हजार क्लर्क की वेकेंसी निकलने वाली है। 10 लाख रेलवे की वेकेंसी निकली, जिसमें 60 लाख से भी अधिक आवेदन आये और इन आवेदनों में अधिकांशत: Engineering, MBA और PHD किये युवा हैं। क्या हमारे शिक्षण संस्थाएं थोक भाव में ऐसे लोग पैदा कर रहे हैं जो क्लर्क बने? हम ये कहते हैं कि हमारी जनसंख्या बहुत अधिक है इसलिए ऐसी समस्या है? पर सच यह है कि अगर बाप ढोलकिया है तो बेटा को भी ढोलकिया बनायेगा। माँ डॉक्टर है तो बेटी का दाखिला Medical college में करा के ही रहेगी। पर एक किसान कभी ये नहीं कहता कि बेटा तुम भी मेरी तरह बनो। एक विधार्थी दूसरे से ये पूछता है कि यार कौन-सा subject ले रहो हो graduation में, मुझे भी लेनी है। खैर आज भी हमारे देश में ऐसे अनेक छोटे-बड़े उदाहरण हैं।

जो न शौक, न शोहरत बस एक मकसद के लिए जी रहे हैं। जिनका सपना होता है समाज और देश को श्रेष्ठता की ओर ले जाना। वे अपने काम से महज अपने शहर को या समाज को या देश को ही प्रभावित नहीं करते बल्कि दुनिया पर असर डालते हैं।

बहरहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि हम क्या दे रहे हैं इस समाज को और क्या योगदान देने वाले हैं? धन्यवाद! आपके बेसकीमती वक्त के लिये। 🙂

महज आकर्षक ही नहीं मैं : नारी

अरे जल्दी करो। ओह ! बाल भी ढ़ंग से नहीं झारी। बिंदी तो ढ़ंग का लगा लेती। चेहरा देखो! मैनें पहले ही कही थी, कोई अच्छी साड़ी पहनना तो ये सलवार-कमीज पहेन ली। अब बस भी करो मां, क्यूँ जरूरी है मुझे आकर्षक लगना? वैसे भी एक साड़ी पहनकर महारानी नहीं बन जाऊँगी। बकवास बंद करो और सीधा चलो। हाँ, एक बात का ध्यान रखना, लड़के वाले जो पूछें सीर्फ उसी का जवाब देना, ज्यादा बकर-बकर मत करना, और नजर थोड़ा नीचे रखना।

बेचारी सरिता कर भी क्या सकती है सदियों से यही तो सिखती आयी है कि उसे पुरूष की तरह सोचना चाहिए, और एक भद्र महिला की तरफ व्यवहार करना चाहिए लेकिन एक युवती सा दिखना चाहिए।

एक स्वतंत्र सोच रखने वाले व्यक्ति के तौर पर अपना आत्म विकास कर पाने के अवसर या उनका दबावमुक्त चयन स्त्री के लिए एक बेहद मुश्किल काम है। सम्भवतः इसी द्वंद्व से बचने के लिए और अपने जीवन को बचाने के लिए स्त्री एक वृताकार जीवन को चुन लेती है, जहाँ उसे गोल-गोल घूमना है।

महिलाओं की असल समस्या यह है कि वे पुरुषों की चाहत के अनुसार खुद को ढ़ालने की कोशिश करती हैं और वो ऐसा हमेशा से करती आई हैं। जब एक स्त्री पूरी तरह से बिल्कुल अपनी होती है, तब भी वह बिल्कुल वैसा ही होना चाहती हैं, जैसा पुरूष उसे देखना चाहते हैं।

इंग्लैंड के चर्चित लेखक डी. एच लॉरेंज अपने लेख गिव हर अ पैटर्न में लिखते हैं कि “एक क्षमतावान पुरुष की आदर्श महिला भी क्षमतावान होती है। डॉक्टर के लिए स्त्रियां नर्स बनीं, कारोबारियों के लिए कार्यकुशल सिक्रेटरी। लेकिन पुरुषों की नजरों में महिलाओं की सबसे पुरानी और पक्की तस्वीर अगर किसी की है, तो वह है उसकी ‘कामुक्ता’ यानी सोंदर्य। इसलिए ज्यादातर महिलाएं पुरुषों की इसी आकांक्षा को पूरा करने की जुगत में लगी रहती हैं।”
और दुर्भाग्य यह है कि इसी कारण महिलाओं का अपना आत्म उनसे दूर चला जाता है। उनके पास वह हर कुछ है, जो पुरुषों के पास होता है। ऐसा नहीं है कि उनके पास अपनी सोच नहीं है, उनके पास हमेशा अपना एक रास्ता होता है, जिसे वे नजरअंदाज करती रहती हैं और वही करती है, जैसा कि पुरुष चाहते हैं, उसी लींंक पर चलती है, जिन पर उन्हें चलने को कहा जाता है और यही अंततः उनके दुख का कारण भी बनता जाता है।

एक स्त्री तब तक अपने आत्म को नहीं जी सकती, जब तक वह किसी के बताये रास्ते पर चलना छोड़कर, हर तरह के पुराने ढर्रो से मुक्त होते हुए अपने रास्ते पर चलना शुरू कर दे।

हालांकि एक स्त्री होने के नाते उनके लिए यह एक मुश्किल भरा काम है। इसलिए वो हर जख्म की एक कहानी बनाती जाती है और अधिकांश को छिपाना जरूरी समझती है।

एक महिला को आकर्षक दिखना उनकी अपनी इच्छा होनी चाहिये, पुरुष प्रधान के मनोरंजन के लिए नहीं।

पूंजी द्वारा लगातार मर्दवादी नजर से महिला को गढ़ना, तराशा जाना, सराहना। एक पुरुष को सेक्सुअली आकर्षक दिखने की वह मजबूरी क्यों नहीं होती, जिसमें उसे कपड़े उतार कर खुद को स्वीकार करवाना पड़ता हो? चेहरे-शरीर पर कृत्रिम साधन थोपने पड़ते हों? फिल्म-टीवी-मनोरंजन में महिलाओं को निर्वस्र करने की मजबूरी पुरुषों के मनोरंजन के लिए नहीं तो और क्या है? हम इसका तोड़ आधुनिकता से करते हैं। पर सच तो यही है कि हम उन्हें सम्मान नही पुरस्कार दे रहें हैं। सम्मान तब होता है जब हम उनकी इच्छा का आदर करते हैं और पुरस्कृत तब किया जाता है जब हमारी इच्छा होती है।

यह कहावत बॉलीवुड में चरितार्थ होती दिखती रही। यहाँ आज बोलती हुई स्त्रियां तो है फिल्मों में, लेकिन बहुत कम फिलमें ऐसी है, जहाँ उनका बोलना समाज से सुने जाने की मांग रखता है। स्त्रियां खुद को तंदूरी मुर्गी कहे या खुद को एंटरटेनमेंट माने, इसे न स्त्री की भाषा कह सकते हैं, न ही स्त्री का मन उसमें झांकता है।

महिलाएं खुद के लिए समय नहीं निकाल पाती। हमेशा अपनों/दूसरों के लिए करती/सोचती रहती है। मेरा माना है कि महिलाएं जब खुद के लिए समय निकालेंगी, गतिशील होंगी तभी सही मायने में उनका सशक्तिकरण होगा।

सरिता पूछतीं हैं –

राजे! क्या हमारी ‘जिस्म’ वीणाएं है, जिन पर तुम्हारी थिरकती हुई तन्मयंता की अंगुलियों से सारे राग पूरे हो जाते हैं, जो युग-युग तक अधूरे छूट आए हैं।

राजे! क्या सिर्फ मेरी ‘जिस्म’ वीनाएं तो नहीं लगती है तुम्हें?
क्या सच में मेरा होना तुम्हें अच्छा लगता है?

सरिता मुस्कुराते हुए और चेहरे पर शक लिये हुए फिर पूँछती है, क्या तुम दिलफेंक तो नहीं हो?

मेरे छोटे कपड़े तुम्हारी कामुक्ता बढ़ाती है और बुर्के में देखकर चिढ़ जाते हो। यानि तुम ये चाहते हो कि मैं तुम्हारी इच्छाओं की सॉल सिलाऊँ और तुम्हारे होने से पहले भी ओढ़ता रहूँ।

क्षमा करना राजे! मुझे तुम्हारी नियत पे शक हो रही।

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Conversation on population growth (जनसंख्या वृद्धि): Good or Bad?

विश्व की कुछ चुनौतियों में से जनसंख्या वृद्धि एक महत्वपूर्ण चुनौती है। जब हम संसाधनों की बात करते हैं तो, हमें इसकी सीमित मात्रा को लेकर नहीं, बल्कि अपनी वृद्धि को लेकर चिंतित होने चाहिए। आइए कुछ सवालों और जवाबों के अनुसार, ये जानने की कोशिश करते हैं कि “क्या जनसंख्या वृद्धि हमारे लिए जरूरी है या नहीं?”

Kumar: आज जनसंख्या एक महत्वपूर्ण विषय क्यों बनी हुई है?
Swati routh: हमनें किसी अन्य प्राणियों की तुलना में सर्वाधिक इस ग्रह को प्रभावित किया है। मनुष्य अपनी सुलभता और खुबसूरत जीवनयापन के लिए इस पृथ्वी यानि प्रकृति को लगातार संसोधित और नियंत्रित करता जा रहा है। हम जानते है कि हमारे पास सीमित संसाधन और रहने के लिए अबतक मात्र एक ग्रह है, जबतक हम रहने के लिए एक और घर न खोज लें, तबतक यह प्रश्न हमारे लिए कोई आश्चर्यजनक! नहीं, बल्कि यह एक मूलभूत प्रश्न है। इसने हमारी चुनौतियों को महत्वपूर्ण बना दिया।

Kumar: क्या हम ये जानते हैं कि आज दुनिया भर में कितने लोग हैं?

Swati routh: नहीं, बिल्कुल नहीं। इस ग्रह पर इतने सारे लोग हैं कि इनकी कुल गिनती नहीं की जा सकती। बिल्कुल असंभव है। यह एक ऐसी समस्या है, जिसकी पूर्णत: गणना करना अभी हमारे लिए आसान नहीं है। हम इनका अनुमान लगाते हैं, हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि आज दुनियाभर में लगभग 7.6 billion (Oct. 2017) लोग हैं। इसे एक विश्वसनीय अनुमान माना जाता है।

Kumar: क्या दुनिया में कोई ऐसे हिस्से हैं, जहाँ जनसंख्या नहीं बढ़ रही है? और वे कौन से देश हैं? जिनकी आबादी तेजी से बढ़ रही है।

Swati routh: हाँ। हम मोटे तौर पर जापान, रूस और पश्चिमी तथा पूर्वी यूरोप के कुछ हिस्से को ले सकते हैं, जहाँ आबादी स्थिर है या बहुत ही धीमी गति से बढ़ रही है। दूसरी ओर भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया, बांग्लादेश, USA, ऑस्ट्रेलिया और चीन सहित दुनिया भर के हर दूसरे हिस्से में आबादी बढ़ी है। कुछ देश जनसंख्या विस्फोट की स्थिति में हैं।

Kumar: क्या ऐसा नहीं किया जा सकता- जहाँ पृथ्वी के दूसरे हिस्से खाली है, अथवा जनसंख्या जहाँ बहुत ही कम है। वहाँ इन्हें विस्थापित किया जाय।

Swati routh: नहीं, नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं किया जा सकता, वो भी हमारे लिए, क्योंकि हमें जीवित रहने के लिए हमारी मूलभूत आवश्यकताएं चाहिए। ऑक्सीजन के लिए पेड़-पौधे, जंगल होने चाहिए। हमारे भोजन के लिए विशाल खेतों की आवश्यकता है, पानी के लिए नदियों का होना आवश्यक है। पृथ्वी पर अधिकांश हिस्से ऐसे हैं, जहाँ हम इन चीजों की उपज नहीं कर सकते। कुछ इलाके हैं भी तो वे रहने योग्य नही है। कुछ बहुत ही ठंड है, तो कुछ रेगिस्तानी, कुछ पहाड़ी हैं, जहाँ हम इस आधुनिकता भरी दुनिया में खुद को सहज नहीं रख पायेंगे और हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि इस ग्रह पर सिर्फ एक मनुष्य ही प्राणी नही है।

Kumar: मानवता से अधिक महत्वपूर्ण जनसंख्या सुलझाने का क्या मतलब है? क्या हम एक परिवार की इच्छा या उनकी आवश्यकता के विरुद्ध, यह कानून थोप सकते हैं कि एक सीमित संख्या के बाद आप बच्चे पैदा नहीं कर सकते यदि करते हैं तो, उन्हें कई तरह की सुविधाओं से वंचित रहना पड़ेगा। जैसा कि हमने चीन की सरकारी नीतियों में देखा है।

Swati routh: बिल्कुल सही कहा आपने। ये सवाल हरेक के मन में होना स्वाभाविक है खास कर हमारे देश में, जहाँ आज भी आधी आबादी, बच्चों का जन्म लेना ईश्वरीय प्रसाद समझते हैं।                                                   ‘मानवता’ एक ऐसा शब्द है, जिसे मनुष्य अपनी परिस्थितियों के अनुसार ढालता है। शदियों पहले जब हम पेड़ों को काटकर अपनी अधिकांश आवश्यकताएं पूरी करते थें। वही आज अगर एक पौधा भी काटते हैं तो हमारे अंदर मानवता नहीं है। एक आतंकवादी भी अपने समुहों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। एक ओर हमें मांस बड़े स्वादिष्ट लगते हैं, वही दूसरी ओर एक पशु की हत्या हमें कटघरे में डाल सकती है। कहने का तात्पर्य अब हमें मानवता के लिए अपनी संख्या में कमी करनी है। इस कमी के लिए युद्ध, अकाल, बीमारी जैसे कष्टदायक कारकों की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इसलिए आवश्यक है कि हमें अपनी जन्म दरों में ही कमी करनी पड़ेगी।

Kumar: कुछ लोगों का कहना है कि प्रौद्योगिकी यानी Technology किसी भी संसाधन की कमी का हल निकाल सकती है। जिसका सामना हम कर रहे हैं। क्या ये संभव अथवा सच है?

Swati routh: मनुष्य एक अविश्वसनीय और रचनात्मक प्रजाति है। जिसके लिए कुछ भी करना आसान है। लेकिन यह जानना महत्वपूर्ण है कि प्रौद्योगिकी संसाधनों का निर्माण नहीं करती। प्रौद्योगिकी केवल प्रकृति में मौजूद दो या अधिक तत्वों को मिलाकर अपनी रचनात्मकता से एक नई वस्तु बनाती है। ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत यह बताता है कि “ऊर्जा का न तो निर्माण संभव है न ही विनाश, केवल इसका रुप बदला जा सकता है।” दूसरी ओर यह बात भी गलत साबित हो गई है कि अधिकतम जनसंख्या = अधिकतम उत्पादन। कम जनसंख्या वाले देश भी आधुनिक तकनीकों की मदद से अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा सकते हैं।

Kumar: जनसंख्या वृद्धि मांग को बढ़ाती है और मांग के बढ़ने से रोजगार को बढ़ावा मिलता है। इसे आप किस रुप में देखतीं हैं?

Swati routh: बिल्कुल सही है कि जनसंख्या वृद्धि मांग और पूर्ति को बढ़ाती है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि परिवार की संख्या बढ़ने पर उसकी आमदनी में वृद्धि हो, परन्तु निश्चित रुप से व्यय बढ़ जाती है। दूसरी ओर आज के वैश्विक बाजार में यह कहना कठिन है, कि यह मांग उस राष्ट्र के लिए हितकर होगी या नहीं? यह उसकी वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर निर्भर करेगी।

Kumar: नए ज्ञान की खोज व उसका विकास कर, दक्षता एवं निपुणता को बढ़ावा देना मानव का स्वभाव है, जो स्वयं जनसंख्या का परिणाम है, जो सृजनात्मक मस्तिष्क का सृजन करती है। नए ज्ञान का भण्डार बढ़ता है, जिससे कौशल को बढ़ावा मिलता है। फलस्वरूप राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि होती है। क्या ये कारण जनसंख्या वृद्धि को प्रोत्साहित करती है?

Swati routh: नहीं, ऐसा हम नहीं केह सकते। यह सीधा शिक्षा सेे जुड़ मामला है। अगर ऐसा होता तो, हम अमेरिका सेे ज्यादा नए तकनीक बनाते। हमारी स्वाास्थ्य सुविधाएं उनसेे बेहतर होती। दुनिया में किसी भी प्रतिभा का उभरना शिक्षा का परिणाम है।

Kumar: मेरी नजर में लगता है कि हम बच्चों की संख्या बढ़ाने में रूचि इसलिए रखते हैं, ताकि हमारा बुढ़ापा सुरक्षित रहे। हम एक पुत्र की आशा में कई बेटियों की संख्या बढ़ा देते हैं। इसका समाधान क्या हो सकता है?

Swati routh: जैसा कि आपने कहा है। “हम बच्चों की संख्या इसलिए बढ़ाते हैं, ताकि हम ज्यादा सुरक्षा महसूस करें।” बिल्कुल हमें सुरक्षा चाहिए। अगर हमें अच्छी सुरक्षा और सुविधा मिले तो क्यूँ हम अपनी कम बजट में अधिक बच्चे पालना चाहेंगे। कई विकसित देशों में ऐसी सुविधाएं सरकार व निजी संस्थानों द्वारा दी जाती है, पर हमारे देश में ऐसी सुविधाएं लगभग शून्य है और हमें रीति-रिवाजों से भी ऊपर उठना होगा। हालांकि हम भारतीय धीमी गति से इस प्रगति पर हैंं।

कहाँ गई वो झिलमिलाती पत्तियों की छांव और सरसराती वो ठण्डी हवा?

सत्यमेव जयते (Television series) में एक बहुत ही खुबसूरत गीत गाई गयी थी। आइए इसे दोहराते हैं, अपने वास्तविक मुद्दों से पूर्व।

हौले-हौले धीमे-धीमे, मिट्टी बोले माटी बोले।

गीत बोने थें तुम्हें, बो दिये क्यों लाल शोले।

घर के आंगन में कहाँ से, ये लपट सी आ गयी।

खिलाड़ियों की थी वो रौनक, धूप अब कहाँ गयी।

क्यों हवा है रुठी रुठी, शाक गुमसुम क्यों न डोले।

गर्म है माथा सागर का, तबियत ढीली-ढीली।

देखो छलकती आसमान की, आँख नीली-नीली।

किसने पानी को जलाया, कौन विष झीलों में घोलें।

हौले-हौले धीमे-धीमे, मिट्टी बोले माटी बोले।

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PLEASE SAVE OUR EARTH

हम बात कर रहे हैं “प्रदूषण” पर, प्रदूषण का नाम लेते ही हमारा मन, मस्तिष्क सचेत होने लगता है और हमारी इन्निद्रयाँ क्रियाशील हो जाती है, अगर किसी दूषित जगहों से गुजर रहे हैं, तो हम अपना नाक-मुँह मूंद लेते हैं या अपनी चाल बढ़ा देते हैं। कई बार हम कुल seconds के लिए अपनी साँसें भी रोक लेते हैं। जरा सोचिए क्या छोटे बच्चे हमारी तरह सचेत होते होंगे? क्या वे हमारी तरह कुछ seconds के लिए साँसें रोक पाते होगें? वे बस सेहते जाते होंगे, चाहे गंदी हवा हो या साफ। हमारी आज की स्थिति भी बिल्कुल इन्हीं की तरह है। हम परिपक्व हो गए हैं सेहते-सेहते। जब तक हमें ये नहीं बताया जाता कि आपको हार्ट की बीमारी है। आपकी एक लीवर फैल हो गई है, तब तक हम अपने स्वास्थ्य को लेकर पूरी तरह अनभिज्ञ रहते हैं। इसके बाद हम जागते हैं, व्यायाम के लिए, यहाँ भी समस्या है। डॉक्टर ने कहा है कि ” आप ज्यादा तेज दौड़ नहीं सकते, नहीं तो आपकी दोनों हार्ट फैल हो सकती है। टांग ऊपर करके किसी भी प्रकार का कसरत नहीं कर सकते। यहाँ तक आते-आते बहुत देर हो चुकी होती है। अब हर-रोज एक नए खूबसूरत रंग और आकृति की गोटियां निंगलनी पड़ती है।

खैर आगे बढ़ते हैं। पूरे विश्व की यह एक गंभीर समस्या है। कई ने अपने-अपने तरीकों से समाधान भी किये और कुछ अभी लगे हैं। हमारा देश इसमें प्रमुख स्थान, आप समझे न, मेरा मतलब प्रथम स्थान रखता है।

दरअसल हमारे देश या केह लें हमलोग, जबतक कोई बड़ी दुघर्टना नही घटती तब तक हम नहीं चेतते हैं। गांधी मैदान में रावन देहन के दिन सैकड़ों भगदड़ में पिस्ता हुए, तब पता चला, अरे यहाँ तो कड़े इंतजाम करने चाहिए थें। भोपाल गैस कांड हुई, तब हल्का मचना शुरू हुआ कि पर्यावरण का कुछ करना चाहिए, तब जाकर कानून बना। चेतने के लिए यह जरूरी है कि प्रदूषण के आंकड़ों को फैलाने के बजाय, यह फैलाया जाय कि प्रदूषण से लोगों के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है। सिर्फ आंकड़े जारी करना अंधेरे में तीर मारने जैसा है। हरेक डॉक्टर ये बताने में सक्षम नहीं है कि इनकी मौत प्रदूषण के कारण हुई है।

अर्थशास्त्री डॉ. भरत झुनझुनवाला इस विषय को बड़े ही दिलचस्प से बताते हैं। वे बताते हैं- अर्थशास्त्र में दो तरह की वस्तुएं होती है। व्यक्तिगत और सार्वजनिक, व्यक्तिगत वस्तुएं वे वस्तुएं है, जिन्हें व्यक्ति अपने स्तर पर बाजार से खरीद सकता है। जैसे चायपत्ती, कपड़ा, टीवी आदि। सार्वजनिक वस्तुएं वे हैं, जिन्हें व्यक्ति चाहे तो भी अपने स्तर पर हासिल नहीं कर सकता। जैसे कानून, करेंसी, पानी या स्वच्छ हवा, जिन्हें केवल सरकार ही उपलब्ध करा सकती है, इन्हें व्यक्तिगत स्तर पर हासिल करना बहुत ही महंगा पड़ता है। दूसरे सार्वजनिक वस्तु ऐसे होते है, जिन्हें अमीर द्वारा तुलना में कम खर्च करके लिया जा सकता है। जैसे आरओ, फिल्टर का पानी, गरीब उसी पानी को पियेगी जिसे सरकार उपलब्ध कराती है। बिहार की हर गली इसका उदाहरण है। सायद ही आप किसी अमीर को इन नलों में मुँह लटकये देखे होंगे। ऐसी ही स्थित स्वच्छ वायु की है।

सामान्य व्यक्ति न तो आरओ या फिल्टर लगा सकता है, न ही हवा शोधन करने का यंत्र। अगर सार्वजनिक रुप से जल की शुद्धि की जाय तो खर्च न्यून आयेगा। परन्तु अमीर के लिए यह घाटे का सौदा हो जाता है। उनकी फैक्ट्री द्वारा गंदा पानी नाले में बहाया जाता है। प्रदूषण नियंत्रण उपकरण लगाने में उन्हें करोड़ों का खर्च करना पड़ेगा। अतः यह लाभप्रद है कि गंदे पानी को नाली में बहाये और अपने घर में आरओ लगा लें। इसी तरह फैक्ट्री से दूषित हवा छोड़े और अपने घर में वायु शोधन यंत्र लगा लें। AC/ कूलर की गर्म हवाएं छोड़े और अंदर ठंड का आनंद लें।

मैं ये नहीं बताऊंगा कि प्रदूषण का कारण खेत की पराली है या पटाखें, न ही पेरिस जलवायु समझौते की बात करुंगा। बस यही विनति करूंगा कि आपसे जितना हो सके करेंं। अगर Smoking करते हैं तो छोड़ दें, कूड़े न फेंके या फेंकने से मना करें। अपने दीवारों में किसी प्रकार का पोस्टर आदि चिपकाने से मना करें। कूड़े उठाने वाले का सम्मान करें। विशेष अवसर पर उन्हें उपहार भेंट दें। आइए कुछ चित्रों के सहारे सच्चाइयों को देखने का एक और साहस करते हैं।

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हम जानते तो हैं।

हाँ, हम जानते हुए भी कुछ नहीं करते क्योंकि हम सिर्फ एक उपभोक्ता (अंतिम क्रेता) हैं। हम ये भी जानते हैं कि उपभोक्ता कुछ भी कर सकता है, फिर भी हम कुछ नहीं करते, क्योंकि हम एक उपभोक्ता हैं। आइए इसे समझने की कोशिश करते हैं।

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कारगिल युद्ध हमारे लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी। जिसपर हमारी सेना ने विजय दिलायी, पर उस युद्ध ने हमें एक अच्छी सीख दी थी। जब युद्ध चरम पर था, तब हमनें उपग्रह प्रणाली के जरिये दुश्मन के coordinates (स्थान पहचान चिन्ह) का पता करने के लिए America से जीपीएस डाटा (GPS American system) मांगा था। पाकिस्तान से संबंध खराब न हो, इसलिए अमेरिका ने हमें इनकार कर दिया। यह हमारे लिए एक झटका था, जिसने हमें यह सिखाया कि रणनीतिक हथियार हम किसी से तभी खरीद सकते हैं, जब वह उनके लिए कोई नई चीज नहीं हो, और ऐसा लगभग हर टेक्नोलॉजी के साथ होता है। बाद में हमने पूर्णतः स्वदेशी निर्मित उपग्रह कक्षा में स्थापित किया, जो हमारी रक्षा के लिए चारों तरफ नजर गराए हुए हैं, और इस काम के लिए अब हमें किसी के मदद की जरूरत नहीं।
हमारे लिए यह गर्व की बात है, पर अगर हम दूसरी तरफ डिजिटल दुनिया का विश्लेषण करते हैं, तो हम पाते हैं कि भारतीय सेवा-प्रदाताओं और भारतीय Brands की उपस्थिति लगभग शून्य है, सिवाय IT Sector के, जबकि Users (उपभोक्ताओं) में विश्व के दूसरे स्थान का प्रतिधिनित्व करते हैं, चाहे वो किसी क्षेत्र का हो।
भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना- Digital India का मतलब यह है कि हरेक सेवाएं, चाहे वो सरकारी हो या निजी, पारदर्शिता और तेजी के साथ मिले, यानि Digital/Online रूप में मिले। Online Booking, Data Storage, Education, E-commerce, Social Media, Email, Driver less Car, Artificial intelligence ( Robbots) यानि हरेक का संबंध Internet से हो। अब ये जाहिर सी बात है जिस देश या कंपनियां कि सबसे ज्यादा इसपर नियंत्रण होगी, वही दुनिया पर राज करेगी। आज लगभग हरेक बड़ी कंपनियां America, China या Japan की है, पर खास बात यह है कि इनके सबसे बड़े उपभोक्ता हम भारतीय हैं, और हम खुश भी हैं क्योंकि अधिक्तर कंपनियों के संचालक भी एक भारतीय है। जरा एक नजर–

.  अमेरिका Microsoft बनाया, भारत- सत्या नडेला (CEO, Microsoft)

.  अमेरिका Pepsi Co., Coca-Cola बनाया, भारत- Indra Nooyi (CEO)

.  अमेरिका Adobe Systems बनाया, जो एक Software Company है। भारत,- Shantanu Narayen (CEO)

.  अमेरिका CitiGroup बहुराष्ट्रीय कंपनी बनाया, जो बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं से जुड़ी है। भारत- Vikram Pandit (Ex CEO)

.  अमेरिका Berkshire Hathaway Insurance बनाया, जो एक बीमा कंपनी है। भारत- Ajit Jain (President)

.  अमेरिका MasterCard (ATM Card) बनाया। भारत- Ajaypal singh banga (CEO)

.  अमेरिका Quest Diagnostics,जो clinical laboratory service provide करती है। भारत- Surya Mohapatra (Ex CEO)

.  अमेरिका Deloitte बनाया, जो, Professional service provide करती है। भारत- Punit Renjen (Global CEO)

.  अमेरिका ने Google बनाया, जो दुनिया की सबसे बड़ी Search engine है। भारत- Sundar Pichai (CEO)

.  अमेरिका ने Quora, एक ऐसा Platform बनाया जहाँ Users सवाल और जवाब कर सकते हैं। भारत- Balaji Viswanathan, Quora पर सबसे ज्यादा Follow किये जाने वाले शख्स।

And finally,

हम जहाँ हैं वो है- WordPress (American Company)

चीन हमसे भी बड़ा उपभोक्ता है, पर वे इनके उपभोक्ता नहीं है, तो फिर वो दूसरे देश के होंगे? जी बिल्कुल नहीं! देखते हैं एक नजर-
चीन आज अमेरिका को इसलिए पटकनी दे रहा क्योंकि उन्होंने हरेक बड़े ब्रांड के पीछे अपने ब्रांड्स प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खड़े किये।

1.  Amazon के सामने Alibaba ( जो दोनों आज भारत के ब्रांड को पछाड़ने में लगे हैं।)

2.  Google के सामने Baidu

3.  Facebook के सामने Tencent

4.  Twitter के सामने Weibo

5.  Uber के सामने Didi Chusing

6.  YouTube के सामने Youku

7.  Chrome के सामने Ucbrowser

8.  WhatsApp के सामने Wechat

अब सोचें जरा कहाँ है हमारा ब्रांड और कैसे जीतेंगे हम Digital लड़ाई? दूसरी और हम भारतीय उछाल-उछाल कर इन्हें समर्थन दे रहे हैं। आखिर हम कर भी क्या सकते है। हम तो ठहरे उपभोक्ता! हमें जो सामान Chief and best लगेगी, हम उसी का इस्तेमाल करेंगे। हालांकि Digital Indian द्वारा सरकार ने कई Apps बनाये हैं। हम भी चाहते हैं कि अपनी technology इस्तेमाल करें, पर इस्तेमाल करते हुए हम ठगे महशूस करते हैं और फिर हमें छोड़ना पड़ता है, क्योंकि हमें तो Chief and best चाहिए।
सच तो ये है कि हम बंधे हुए हैं विदेशी कंपनियों द्वारा और अपनी सारी जानकारियां उन्हें देते चले जा रहे हैं। हाल ही में यह बहस छिड़ी थी कि कंपनियां Users के Call details यानि बात-चीत के आधार पर विज्ञापन दिखाती है, यानि आप फोन पर क्या बात करते हैं, क्या Message लिखते हैं, उन्हें सब पता होता है, और हमने देखा भी है कि कैसे YouTube, Facebook, Google आदि में, हम जो Search करते हैं उसी से जुड़े ज्यादा Contents दिखाये जाते हैं।

गलत हमारे साथ ये हुआ कि हमें वो विजन, वो माहौल और वह सरकारी सहयोग हमारे उधमियों को वक्त के अनुसार न दिया गया। हमें ये सिखाया गया कि बेटा दरवाजा बंद करके पढ़ो। अच्छी कंपनी में नौकरी लग जायेगी।
खैर अब भी वक्त है हमें समझने की, पर हमें क्या मतलब दूसरों से, हम तो खुद एक उपभोक्ता है।

 

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Make Joke Of :  कल्पनाएं रचनात्मकता का आधार है।

हर नया प्रोडक्ट, सेवा या उधम के पीछे एक आइडिया होता है। इसके लिए market का सर्वे किया जाता है। लोगों की पसंद-नापसंद को समझा जाता है। उनकी क्रयशक्ति के बारे में जानकारी इकट्ठा की जाती है और एकबार आइडिया स्थापित हो जाने के बाद उसे तेजी से आगे बढ़ाने के लिए हमें अक्सर या हमेशा परंपरागत चीजों को तोड़ना पड़ता है। जबतक आप किसी चीज को तोड़ेंगे नहीं आप तेजी से आगे नहीं बढ़ पाएंगे।

मेरे ख्याल से मुझे लगता है कि दुनिया में लोग क्रिएटिविटी और इनोवेशन से भड़े पड़े हैं, लेकिन अधिकांशतः लोग उस क्रिएटिविटी और इनोवेशन को follow नहीं कर पाते। वे बस उन्हें “दिमाग की उपज” या फिर एक कल्पना मात्र समझकर जाने देते हैं लेकिन हमें इन चीजों को हमेशा नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। क्योंकि ये पलभर की बात होती है। विचार आता है और तेजी से ओझल हो जाता है। मुझे लगता है कल्पनाएं विशेष मानवीय गुण है और यही सभी इनोवेशंस का मूल है। कल्पनाएं ही क्रिएटिविटी का आधार है।

‎आइए एक video cartoon animator के बारे में जानते हैं।

Make Joke Of

 https://youtu.be/1bSLrOlRIB4

Click on this link & Watch Make Jock Of

UP (Uttarpradesh) की भाषा बॉलीवुड से लेकर टेलीविजन इंडस्ट्री में छायी हुई है लेकिन अगर बात केवल कानपुर की करें तो इस शहर के मिजाज से लेकर लोकल भाषा का अंदाज सबसे जुदा है। इन दिनों Social Media पर कनपुरिया भाषा में बने “Make Joke Of” Videos खूब छाये हुए हैं। Cartoon carrectors के मुंह से निकलते डायलॉग दर्शकों को एक अजीब सी खुशी देते हैं। YouTube के Popular channel “Make Jock Of” के बारे में कुछ खास बातें।

Make Joke Of  के YouTube पर 1,816,096 से भी अधिक  Subscribers हैं। जबकि हर एक वीडियो पर 50 लाख से ज्यादा Views हैं। इस वीडियो को बनाने वाले कुछ कलाकार हैं जो कनपुरिया भाषा में एनिमेटेड वीडियो बनाकर सामाजिक मुद्दों पर तंज कसते हैं। यह 12 अक्टूबर 2016 में शुरू हुआ था। Facebook पर भी Make Joke Of  पेज को 2.1 लाख से अधिक लोग फॉलो करते हैं। इन Videos का कंटेंट Original और Simple होता है। लेकिन इनकी असली इनोसेन्स कॉमेडी को देखकर दर्शक अपना पेट पकड़ने को मजबूर हो जाते हैं।

इन आर्टिस्टों की खास बात यह है कि इन लोगों ने कानपुर की भाषा का तो इस्तेमाल किया है लेकिन अपने कंटेंट में कहीं भी अभद्र भाषा प्रयोग नहीं की। यही वजह है कि ये चैनल तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है।

And last…

😊😊😊😊😊😊😊😊😊

लड़की : सुनो..

लड़का : हु

लड़की : हम तुम्हे बहुत चाहते है|

लड़का : हूँ!!

लड़की : आइ लव यु

लड़का : हु हूँ.

लड़की : हम तुमसे प्यार करते है

लड़का : हु हु हुँ!!

लड़की : कुछ बोलो ना..

लड़का : हू हुँ हुँ

लड़की : गूगे हौ का..

लड़का : हूँ….ऊहूँ..

लड़की : साले बोल काहे नही रहे हो बे…कुत्ते……

लड़का :आक थू!!!!!

साला तोहार इशक के चक्कर मे पूरी रजनीगंधा थुका दिये …..

😊😊😊😊😊😊😊😊

हप्पुसिंह – डाक्टर साब हमाओ इलाज कर दे|

डॉक्टर – तुम्हारा ये हाल कैसे हुआ?

हप्पुजी– छत पे धरी थी 500 ईँटे, सब नेंचे ल्याने थी,

ऐसे 5-10 करके ल्याते तो परेशान हो जाते ।

सो हमने एक उपाय सोचो ।

छत पे धरी हती एक टंकी,

टंकी मे भर दई 500 ईँटे,

फिर एक रस्सा बांद दओ

और कुन्दा मे फँसाकें रस्सा नेंचे लटका दओ ।

हमने नेंचे जाके रस्सा पकडो

सो टंकी नेंचे लटक

गई ।

अब टंकी 500 किलो की

और हम धरे 50 किलो के

सो टंकी सरसरात नेंचे आ रई और हम सरसरात ऊपर

जा रए।

टंकी जैसई नेंचे गिरी

सो उको तल्ला खुल गओ

और

सब ईँटे बाहर कड़ गई।

अब टंकी बची 25 किलो की

और हम हते 50 किलो के,

सो हम सरसरात नेंचे आ रए

और टंकी सरसरात ऊपर

जा रई।

हम जैसई गिरे ईटो के ढेर पे

सो हमाई करहाई टूट गई।

और

हमाए हाथ से रस्सा छूट गओ

अब रस्सा सरसरात ऊपर जा रओ

और टंकी सरसरात नेंचे आ रई

और गिरी हमाई खोपड़िया पे,

सो हमाई खोपड़िया फूट गई।

बडी बिटम्मना है

अब तुमई अच्छो इलाज करो डाक्टर साब ।

डॉक्टर साहब बेहोश!